मनोज कॉमिक्स की मशहूर कृति ‘चक्रव्यूह’ पराक्रमी योद्धा युगान्धर के साहसिक जीवन की ऐसी कहानी है जिसमें वीरता और समझदारी का बेहतरीन मेल देखने को मिलता है। युगान्धर कोई साधारण नायक नहीं है; वह ऐसा योद्धा है जिसका जीवन धर्म की रक्षा और अधर्म के विनाश के लिए समर्पित है। एक तपस्वी की तरह शांत और वज्र की तरह कठोर, युगान्धर का अस्तित्व प्राचीन भारतीय फंतासी और जादुई शक्तियों के बीच बुना गया है। उसके पास लकड़ी का बना एक चमत्कारी ‘अमोघ रथ’ है, जो सिर्फ उसकी सवारी ही नहीं बल्कि युद्ध के मैदान में उसका सबसे बड़ा हथियार भी है।

युगान्धर का जीवन केवल दुश्मनों को हराने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह कठिन से कठिन षड्यंत्रों को अपनी बुद्धि से समझकर तोड़ देता है, और ‘चक्रव्यूह’ इसी मजबूत इरादे की एक बेहतरीन मिसाल बनकर सामने आती है।

लहू सागर और हड्डियों का महल: एक ऐसी दुनिया जहाँ रोंगटे खड़े हो जाते हैं!

कहानी की शुरुआत किसी हॉरर फिल्म से कम नहीं लगती। लेखक टीकाराम सिप्पी हमें एक ऐसे काल्पनिक स्थान पर ले जाते हैं जहाँ ‘लहू सागर’ यानी खून का समुद्र बहता है। इस डरावने समुद्र के बीच बना है ‘कंकाल महल’, जो पूरी तरह इंसानी हड्डियों से तैयार किया गया है। यहाँ की रानी है ‘खूनपुत्री’। कल्पना कीजिए, एक ऐसा महल जो दिन में समुद्र से बाहर निकलता है और सूरज ढलते ही फिर लहरों में गायब हो जाता है। यह रहस्यमयी माहौल पाठक को पहले ही पन्ने से कहानी से जोड़ देता है।

पंपापुर पर मंडराता मौत का साया: क्या यह कोई बीमारी है या खौफनाक साजिश?

कहानी का मुख्य केंद्र है पंपापुर राज्य, जहाँ अचानक एक रात में अफरा-तफरी मच जाती है। लोग किसी अज्ञात बीमारी का शिकार होकर तड़पने लगते हैं और उनके शरीर का खून पानी में बदलने लगता है। राजकुमारी शैल-शबीली अपने लोगों को मरते हुए देखकर बेबस है। राजवैद्य सलाह देता है कि केवल ‘लहू सागर’ का शुद्ध रक्त ही इस बीमारी को रोक सकता है।

यहीं से शुरू होता है युगान्धर का मिशन, जिसे खुद राजकुमारी ने मदद के लिए बुलाया है। लेकिन क्या यह मिशन इतना आसान होने वाला है?

युगान्धर और उसकाअमोघ रथ‘: वह लकड़ी का घोड़ा जो दुश्मनों का दिमाग बदल देता था!

युगान्धर की सबसे बड़ी पहचान उसकी तलवार नहीं, बल्कि उसका ‘अमोघ रथ’ है। यह लकड़ी का बना एक चमत्कारी यांत्रिक घोड़ा है, जो हवा से भी तेज दौड़ सकता है और एक अनोखी शक्ति रखता है। इस रथ की खास बात यह है कि जो भी इस पर चढ़ता है, उसका दिमाग बदल जाता है—दुश्मन भी दोस्त बन जाता है।

पृष्ठ 12 पर जब युगान्धर सेनापति घनघोर की सेना को बिना मारे अपने साथ कर लेता है, तो यह दृश्य पाठकों को चौंका देता है। यह नायक की महानता दिखाता है कि वह लड़ाई के बजाय शांति का रास्ता चुनता है।

चूँषक और उसकी जहरीली नसें: एक ऐसा विलेन जिसे देखकर आज भी डर लगता है!

इस कॉमिक्स का सबसे डरावना पात्र है ‘चूँषक’। उसका बैंगनी चेहरा, उभरी हुई नसें और उंगलियों से निकलने वाली लंबी रक्त-शिराएं किसी को भी डराने के लिए काफी हैं। वह लोगों के शरीर में ‘तामसी गुण’ वाले कीटाणु फैलाकर उन्हें राक्षस बना रहा है। चूँषक का चित्रण कलाकार विजय कदम ने इतनी बारीकी से किया है कि वह आज के किसी आधुनिक विलेन से कम नहीं लगता।

उसके पीछे एकटांग और एकहाथ जैसे चालाक तांत्रिकों का दिमाग है, जो युगान्धर को खत्म करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।

महर्षि भस्मासुर का कटा हुआ हाथ: वह सस्पेंस जिसने पूरी कहानी ही पलट दी!

कहानी का सबसे बड़ा ट्विस्ट है महर्षि भस्मासुर का किरदार। यह पौराणिक भस्मासुर नहीं, बल्कि एक महान तपस्वी है। जब वे समाधि में भस्म यानी राख का रूप लिए हुए थे, तभी किसी ने उनका एक हाथ चुरा लिया। इस घटना ने महर्षि को क्रोध से भर दिया।

वह कटा हुआ हाथ पूरी कहानी में एक अहम कड़ी की तरह काम करता है। क्या युगान्धर इस हाथ को वापस ला पाएगा? या फिर महर्षि का क्रोध पंपापुर को राख बना देगा?

जादुई मथनी और कालपुत्र: जब समुद्र मंथन की कथा को मिला एकडार्क ट्विस्ट‘!

विलेन कालपुत्र लहू सागर को अपनी विशाल ‘मथनी’ से मथ रहा है। उसका मकसद है ‘स्वक्खन’ यानी खून का शुद्ध तत्व चुराना। समुद्र मंथन की प्राचीन कथा का यह नया और डरावना रूप पाठकों को काफी प्रभावित करता है। कालपुत्र का घमंड और उसकी ताकत युगान्धर के लिए बड़ी चुनौती बनकर सामने आती है। पृष्ठ 27 पर जब वह अपनी मथनी से हवा को भी मथने की बात करता है, तो कहानी का रोमांच और भी बढ़ जाता है।

खूनपुत्री की प्रतिज्ञा: जब नायिका ही बन गई नायक की सबसे बड़ी दुश्मन!

गलतफहमी किसी भी युद्ध को जन्म दे सकती है। जब युगान्धर पंपापुर के लिए खून लेने पहुँचता है, तो उसका सामना खूनपुत्री के भाई ‘लहूबल’ से होता है। युद्ध के दौरान लहूबल की गंभीर हालत देखकर खूनपुत्री युगान्धर की जान की दुश्मन बन जाती है।

एक ऐसी स्थिति बन जाती है जहाँ नायक चारों तरफ से घिर जाता है—एक तरफ चूँषक का जहर, दूसरी तरफ भस्मासुर का अग्नि पिंजरा और तीसरी तरफ खूनपुत्री की तलवार। यही वह ‘चक्रव्यूह’ है जिसे युगान्धर को अपनी समझ और बुद्धिमानी से तोड़ना है।

विजय कदम का आर्टवर्क: रंगों और कल्पनाओं का एक बेमिसाल संगम!

विजय कदम और नीता बोराडे ने इस कॉमिक्स को अपनी कला से यादगार बना दिया है। ‘लहू सागर’ का गुलाबी और लाल रंग, ‘कंकाल महल’ की डरावनी सफेद दीवारें और एक्शन दृश्यों में शरीर की गति बेहद प्रभावशाली लगती है। खासकर पृष्ठ 33 पर जब युगान्धर हवा में उछलकर वार करता है, तो वह दृश्य आज की एनिमेटेड फिल्मों जैसा असर पैदा करता है।

चटक रंगों का इस्तेमाल कहानी के फंतासी माहौल को और मजबूत बनाता है।

क्लाइमेक्स: क्या युगान्धर इस तिलिस्मी जाल से जीवित निकल पाएगा?

कहानी के अंत में जब युगान्धर को ‘अग्नि पिंजरे’ में कैद किया जाता है, तो पाठकों की धड़कनें तेज हो जाती हैं। लेकिन युगान्धर का असली हथियार उसकी तलवार नहीं, बल्कि उसका दिमाग है। वह कैसे महर्षि भस्मासुर को सच बताता है और कैसे कालपुत्र के घमंड को तोड़ता है, यह पढ़ना बेहद रोचक लगता है।

अंत में पंपापुर के लोगों का स्वस्थ होना और युगान्धर का अपने रथ पर विदा लेना कहानी को संतोषजनक समापन देता है।

समीक्षक की अंतिम राय: क्यों हर कॉमिक्स प्रेमी को पढ़नी चाहिएचक्रव्यूह‘?

‘चक्रव्यूह’ केवल एक कहानी नहीं है, बल्कि यह उस दौर की रचनात्मकता का बेहतरीन उदाहरण है। इसमें एक्शन, भावनाएं, सस्पेंस और फंतासी का संतुलित मेल देखने को मिलता है। 62 पन्नों की यह यात्रा पाठकों को ऐसी दुनिया में ले जाती है जहाँ बुराई चाहे कितनी भी ताकतवर क्यों न हो, सच और बुद्धि के सामने उसे झुकना ही पड़ता है।

निष्कर्ष: क्या युगान्धर का यहचक्रव्यूहआज के मार्वल और डीसी को टक्कर देता है?

आज जब सुपरहीरो की बात होती है तो अक्सर नजर हॉलीवुड की ओर जाती है, लेकिन युगान्धर जैसे देसी नायक हमें याद दिलाते हैं कि हमारी कहानियों में भी दम है। ‘चक्रव्यूह’ एक ऐसी मास्टरपीस है जिसे हर उस व्यक्ति को पढ़ना चाहिए जो भारतीय कॉमिक्स संस्कृति को समझना चाहता है।

यह कॉमिक्स हमारी परंपरा और आधुनिक कल्पना का ऐसा मेल है, जो समय के साथ भी पुराना नहीं पड़ता।

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