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Home » सिकंदर की जंग (Manoj Comics): विक्रम से सिकंदर बनने की दर्दनाक कहानी जिसने 90s Comics Lovers को हिला दिया
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सिकंदर की जंग (Manoj Comics): विक्रम से सिकंदर बनने की दर्दनाक कहानी जिसने 90s Comics Lovers को हिला दिया

'Sikandar Ki Jung' सिर्फ एक बदले की कहानी नहीं, बल्कि दर्द, संघर्ष, और एक हाथ खोकर भी न्याय के लिए खड़े हुए नायक की जन्मगाथा है।
ComicsBioBy ComicsBio27 March 2026Updated:27 March 2026No Comments7 Mins Read21 Views
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सिकंदर की जंग — एक हाथ खोकर भी न्याय के लिए खड़ा हुआ 90s का सबसे खतरनाक विजिलेंटे
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मनोज कॉमिक्स की दुनिया में ‘सिकंदर’ एक ऐसा किरदार है जिसने 90 के दशक में अपनी अलग और यादगार पहचान बनाई। ‘सिकंदर की जंग’ (विशेषांक संख्या 63) सिर्फ एक एक्शन कॉमिक्स नहीं है, बल्कि यह नायक ‘विक्रम’ के ‘सिकंदर’ बनने की दिल को छू लेने वाली और रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी है। इसे पढ़कर पाठक के मन में अन्याय के खिलाफ गुस्सा और नायक के लिए सहानुभूति का भाव उमड़ पड़ता है। अंसार अख्तर की लिखी कहानी और हुसैन जामिन के जीवंत चित्र इसे भारतीय कॉमिक्स इतिहास की क्लासिक कृति बनाते हैं।

प्रस्तावना: एक शांत जीवन का अंत

कहानी की शुरुआत मनगर शहर के सन्नाटे से होती है। रात के दो बजे सिकंदर एक सुनसान मकान के पास पहुंचता है। यह वही जगह है जो कभी उसका हंसता-खेलता घर हुआ करती थी, लेकिन अब अपराधियों का अड्डा बन चुकी है।

सिकंदर यहां आकर उन गुंडों को बेरहमी से सबक सिखाता है। यहीं से कहानी ‘फ्लैशबैक’ यानी अतीत में चली जाती है। उस दौर में विक्रम एक आम नौजवान था, जिसके दो ही शौक थे—मोटर बाइक दौड़ाना और रोलर स्केटिंग करना।

वह अपने माता-पिता और छोटी बहन आशा के साथ एक सुखद जीवन जी रहा था। उसके पिता, प्रोफेसर दिवाकर, बहुत ही सिद्धांतों वाले और न्यायप्रिय व्यक्ति थे, जो कभी अन्याय के आगे झुकते नहीं थे।

संघर्ष की शुरुआत: सिद्धांत और अहंकार की टक्कर

कहानी में मोड़ तब आता है जब विक्रम मोहल्ले के लालची दुकानदार ‘लाला’ को एक गरीब नौकर को पीटते हुए देखता है। विक्रम का न्यायप्रिय स्वभाव उसे चुप नहीं बैठने देता।

वह लाला की दुकान में घुसकर उसकी जमकर धुनाई करता है। यहीं से विक्रम की जिंदगी में समस्याओं का सिलसिला शुरू होता है। प्रोफेसर दिवाकर अपने बेटे के हिंसक व्यवहार से दुखी होते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि हिंसा किसी समस्या का समाधान नहीं है।

लेकिन विक्रम का मानना है कि “पापियों के दांत तोड़ देना कमजोरी नहीं है।” यह सोच पिता और बेटे के बीच एक गहरी खाई बना देती है।

इसी बीच विक्रम की मुलाकात उसके पिता के पुराने मित्र ‘अंकल चांग’ से होती है, जो एक चाइनीज रेस्टोरेंट चलाते हैं। चांग की बेटी ‘शशि’ और विक्रम एक-दूसरे से प्यार करने लगते हैं।

यहाँ कहानी में एक मानवीय और कोमल पक्ष जुड़ता है, जो आगे आने वाली त्रासदी को और भी गहरा बनाता है।

त्रासदी का तांडव: जब नायक का सब कुछ छिन गया

कॉमिक्स का सबसे दुखद और अहम हिस्सा वह है जब शहर के माफिया डॉन राजेश्वर सिंघल का बेटा, रंजीत (कुछ जगहों पर अजीत), प्रोफेसर दिवाकर के कॉलेज में चरस तस्करी करते हुए पकड़ा जाता है।

प्रोफेसर दिवाकर उसे पुलिस के हवाले कर देते हैं और कॉलेज से निकाल देते हैं। अपमान का बदला लेने के लिए रंजीत अपने साथियों के साथ प्रोफेसर दिवाकर पर हमला करता है।

विक्रम जब अपने पिता को पीटते हुए देखता है, तो वह काल बनकर गुंडों पर टूट पड़ता है। वह रंजीत को इतनी बुरी तरह पीटता है कि वह मरणासन्न हो जाता है।

लेकिन रंजीत का पिता राजेश्वर सिंघल एक खतरनाक माफिया है। वह अपने बेटे की हालत देखकर पागल हो जाता है और पूरे दिवाकर परिवार को खत्म करने का आदेश देता है।

सिंघल के गुंडे विक्रम के घर को घेर लेते हैं और आग लगा देते हैं। विक्रम की आँखों के सामने उसके पिता, माँ और बहन को बेरहमी से मार दिया जाता है।

सबसे भयावह दृश्य वह है जब रंजीत, विक्रम का वह हाथ काट देता है जिससे उसने उसे मारा था। विक्रम को अधमरा छोड़कर अपराधी वहां से भाग जाते हैं।

कायाकल्प: विक्रम से सिकंदर तक का सफर

अंकल चांग ही वह व्यक्ति हैं जो मलबे से विक्रम को जीवित निकालते हैं। अस्पताल में जब विक्रम की आँखें खुलती हैं, तो उसके पास न परिवार बचा होता है और न ही अपना एक हाथ।

वह पूरी तरह टूट चुका होता है, लेकिन उसके अंदर प्रतिशोध की ज्वाला जल रही होती है, जो उसे मरने नहीं देती। अंकल चांग न केवल उसे सहारा देते हैं, बल्कि मार्शल आर्ट्स, कुंग-फू और विभिन्न हथियारों को चलाने का कठिन प्रशिक्षण भी देते हैं।

विक्रम अपनी शारीरिक कमजोरी को अपनी ताकत में बदल देता है। वह कटे हुए हाथ की जगह विशेष उपकरण और हथियारों (जैसे ‘साई’ और ‘चेन’) का इस्तेमाल करना सीखता है।

उसने रोलर स्केट्स को भी अपनी युद्ध कला में शामिल कर लिया, जिससे उसे बिजली जैसी रफ्तार मिलती है।

यहीं से जन्म होता है ‘सिकंदर’ का—एक ऐसा योद्धा जिसने अपना नाम, पहचान और जीवन सिर्फ एक ही लक्ष्य के लिए समर्पित कर दिया: सिंघल के साम्राज्य का अंत।

चरित्र विश्लेषण

विक्रम का विकास इस कहानी में अविश्वसनीय है। एक बेफिक्र स्केटिंग करने वाले लड़के से लेकर गंभीर और खूंखार ‘विजिलेंटे’ बनने तक का सफर बहुत खूबसूरती से दिखाया गया है।

उसकी विकलांगता उसे केवल एक सुपरपावर नहीं, बल्कि एक दृढ़ इच्छाशक्ति वाला नायक बनाती है। वह अपनी सीमाओं से लड़कर आगे बढ़ता है।

प्रोफेसर दिवाकर नैतिकता के स्तंभ के रूप में सामने आते हैं। उनकी शहादत विक्रम को यह महत्वपूर्ण सबक सिखाती है कि बुराई से लड़ने के लिए कभी-कभी हथियार उठाना पड़ता है, लेकिन वह लड़ाई हमेशा सिद्धांतों के साथ होनी चाहिए।

राजेश्वर सिंघल और रंजीत जैसे अहंकारी और क्रूर खलनायक अपनी शक्ति के मद में डूबे हुए हैं, और उनकी यही क्रूरता अंततः नायक के जन्म का कारण बनती है।

कहानी के भावनात्मक आधार के रूप में अंकल चांग और शशि की भूमिका महत्वपूर्ण है। चांग एक मार्गदर्शक गुरु की तरह हैं, वहीं शशि का निस्वार्थ प्यार विक्रम को उसकी कठिन परिस्थितियों में भी इंसानियत से जोड़े रखता है।

चित्रांकन और कला

हुसैन जामिन की चित्रकारी इस कॉमिक्स की जान है। 90 के दशक में उनका ‘एक्शन सीन्स’ दिखाने का तरीका कमाल का था।

‘जूं’, ‘ठक’, ‘धाड़’ जैसे साउंड इफेक्ट्स के साथ जब सिकंदर स्केट्स पर लड़ता है, तो ऐसा लगता है जैसे कोई एक्शन फिल्म चल रही हो।

आग के दृश्य, विक्रम के कटे हाथ का दर्द और सिंघल की दरिंदगी को बहुत जीवंतता से दिखाया गया है। पात्रों के हाव-भाव और शरीर की बनावट कहानी के प्रभाव को दोगुना कर देती है।

थीम और संदेश

‘सिकंदर की जंग’ सिर्फ बदले की कहानी नहीं है, यह आत्मविश्वास और पुनर्निर्माण की कहानी है। हार तब तक नहीं होती जब तक इंसान मन से हार न मान ले।

एक हाथ खोने के बाद भी विक्रम का हार न मानना और खुद को अपराजेय योद्धा बनाना पाठकों के लिए बड़ी प्रेरणा है।

यह कॉमिक्स न्याय की अवधारणा पर सवाल उठाती है कि जब कानून अपराधियों के हाथों में कठपुतली बन जाए, तो समाज को ‘सिकंदर’ की जरूरत पड़ती है।

समीक्षात्मक निष्कर्ष

मनोज कॉमिक्स ने सिकंदर के रूप में एक ऐसा दमदार किरदार पेश किया जो राज कॉमिक्स के नागराज या ध्रुव जैसे दिग्गजों के समकक्ष खड़ा होता है।

‘सिकंदर की जंग’ इस पूरी श्रृंखला की सबसे महत्वपूर्ण आधारशिला है। कहानी का अंत अत्यंत प्रभावशाली है। सिकंदर सिंघल का अंत करने के बाद पुलिस कमिश्नर को टेप रिकॉर्डर के जरिए यह संदेश देता है कि वह अपराधी नहीं बल्कि ‘अपराध का नाशक’ है।

इस कॉमिक्स का सबसे सकारात्मक पक्ष इसकी मजबूत और भावनात्मक कहानी है, जिसमें विकलांगता को कमजोरी के बजाय एक बड़ी ताकत के रूप में दिखाया गया है।

हुसैन जामिन का बेहतरीन चित्रांकन, तेज रफ्तार एक्शन और सस्पेंस पाठक को पूरी तरह बांधे रखते हैं।

नकारात्मक पक्ष की बात करें तो सिंघल जैसे शक्तिशाली विलेन तक पहुँचने का रास्ता थोड़ा आसान दिखाया गया है, और कुछ संवाद थोड़े ज्यादा फिल्मी लगते हैं। हालांकि, उस दौर के कॉमिक्स लेखन के हिसाब से वे पूरी तरह सटीक बैठते हैं।

अंतिम राय

‘सिकंदर की जंग’ भारतीय कॉमिक्स प्रेमियों के लिए एक ‘कलेक्टर आइटम’ है। यह कहानी याद दिलाती है कि नायक सुपरपावर से नहीं, बल्कि बलिदान और अटूट इच्छाशक्ति से बनता है।

अगर आपने बचपन में मनोज कॉमिक्स पढ़ी हैं, तो यह अंक आपको फिर से उसी रोमांचक सफर पर ले जाएगा। यह जंग नायक के बाहर ही नहीं, बल्कि उसके भीतर भी चलती है।

आज के दौर में जब सुपरहीरो केवल जादुई शक्तियों वाले बन गए हैं, सिकंदर हमें याद दिलाता है कि असली संघर्ष जमीन से जुड़ा होता है।

यह कॉमिक्स न केवल मनोरंजन करती है, बल्कि दिल को झकझोर भी देती है।

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